कजलियों की खनक से महकी विंध्य की माटी: रीवा में पारंपरिक उल्लास, गिले-शिकवे भुलाकर गले मिले लोग
बुलेट रिपोर्टर रीवा। रक्षाबंधन के पावन पर्व के ठीक बाद मनाया जाने वाला लोक आस्था, प्रेम और सामाजिक समरसता का पर्व कजलिया शनिवार को रीवा शहर सहित ग्रामीण अंचलों में पारंपरिक उत्साह और उल्लास के साथ मनाया गया। घरों में विधि-विधान से पूजी गईं हरी-भरी कजलियों के विसर्जन के लिए शहर और गांवों के प्रमुख घाटों पर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी।
विसर्जन के बाद लोगों ने एक-दूसरे को कजलियां भेंट कीं, चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और पुराने गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के गले मिले। पूरे अंचल में पर्व के दौरान सामाजिक सौहार्द और भाईचारे का माहौल देखने को मिला।
घाटों पर आस्था और उल्लास का संगम
सावन-भादों के संधिकाल में मनाया जाने वाला कजलिया पर्व विंध्य की समृद्ध लोक परंपरा और कृषि संस्कृति से जुड़ा हुआ है। पर्व से करीब एक सप्ताह पहले घरों में पात्रों में गेहूं के दाने बोए जाते हैं। शनिवार को जब इनमें हरे-भरे अंकुर निकल आए तो महिलाओं और बच्चों ने श्रद्धापूर्वक उनका पूजन किया।
इसके बाद रीवा के बंबा घाट, बिछिया नदी घाट और अखाड़ घाट सहित ग्रामीण क्षेत्रों के प्रमुख जलाशयों में कजलियों का विसर्जन किया गया। घाटों पर पारंपरिक लोकगीतों की गूंज के बीच श्रद्धा और उत्सव का अनोखा संगम नजर आया।
गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे को लगाया गले
कजलिया पर्व को सामाजिक एकता और आपसी प्रेम का प्रतीक माना जाता है। पर्व के अवसर पर लोगों ने पुराने मनमुटाव और गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे के घर पहुंचकर कजलियां भेंट कीं और सुख-समृद्धि की कामना की।
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने पारंपरिक परिधानों में सिर पर कजलियों की टोकरी रखकर मंगल गीत गाए। इससे गांवों में दिनभर उत्सव और उल्लास का माहौल बना रहा।
फसल और खुशहाली की उम्मीद
कजलिया पर्व का गहरा संबंध खेती-किसानी और प्रकृति से भी है। गेहूं के हरे-भरे अंकुरों को समृद्धि और अच्छी फसल का प्रतीक माना जाता है। किसानों ने कजलियों की हरियाली देखकर आने वाले कृषि सीजन में अच्छी वर्षा और बेहतर पैदावार की उम्मीद जताई।
मिट्टी, प्रकृति और अन्न से जुड़े इस पर्व में विंध्य की पारंपरिक कृषि संस्कृति और लोक जीवन की जीवंत झलक दिखाई दी।
गोविंदगढ़ में दिखी राजसी परंपरा
गोविंदगढ़ में कजलिया मिलन समारोह की ऐतिहासिक परंपरा इस वर्ष भी पूरी गरिमा के साथ निभाई गई। यहां आयोजित कजलिया समागम में पूर्व महाराजा पुष्पराज सिंह विशेष रूप से शामिल हुए।
आसपास के दर्जनों गांवों से पहुंचे नागरिकों ने पूर्व महाराजा को कजलिया भेंट कर उनका अभिवादन किया। पुष्पराज सिंह ने क्षेत्रवासियों की कजलिया स्वीकार करते हुए सभी को पर्व की शुभकामनाएं दीं और विंध्य क्षेत्र में सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना की।
कजलिया पर्व ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि लोक परंपराएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने और आपसी रिश्तों में मिठास घोलने का भी माध्यम हैं।
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