डाबरी के जंगलों में हजारों पेड़ों की कटाई और अतिक्रमण के आरोप, जांच की मांग
बुलेट रिपोर्टर भेरूदा। डाबरी के जंगलों से वन संपदा को लेकर एक गंभीर मामला सामने आया है। वन विकास निगम के कोसमी काष्ठागार अंतर्गत आने वाले डाबरी के कक्ष क्रमांक 259 और 260 में बड़े पैमाने पर सागौन के पेड़ों की कटाई और वनभूमि पर अतिक्रमण के ग्रामीणों ने आरोप लगाए हैं।
बारिश के बीच मौके पर पहुंची मीडिया टीम के कैमरे में जंगल का ऐसा नजारा सामने आया, जिसने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर कई सवाल खड़े कर दिए। ग्रामीणों का दावा है कि पिछले कई दिनों से क्षेत्र में लगातार पेड़ों की कटाई और जमीन को तोड़कर अतिक्रमण की गतिविधियां चल रही हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक, डाबरी नाके से करीब चार किलोमीटर दूर जंगल क्षेत्र में ट्रैक्टर के जरिए जमीन को तोड़े जाने के निशान मिले हैं। मौके पर बड़ी संख्या में काटे गए सागौन के पेड़ और लकड़ी के अवशेष दिखाई दिए। कुछ स्थानों पर लकड़ी जलाए जाने की बात भी सामने आई है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि इतने बड़े पैमाने पर पेड़ों की कटाई हुई है, तो वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को इसकी जानकारी पहले क्यों नहीं लगी?
मीडिया से बातचीत में वन परिक्षेत्र अधिकारी सेप्रिया यादव ने कहा कि उन्हें मामले की जानकारी उसी दिन मिली है और वह इसकी जांच करेंगी। वहीं, एसडीओ भदौरिया ने भी मौके पर पहुंचकर पूरे मामले की जांच करने की बात कही।
हालांकि ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग को पिछले कई दिनों से मामले की जानकारी दी जा रही थी, लेकिन समय रहते कार्रवाई नहीं की गई। ग्रामीणों का यह भी दावा है कि मीडिया टीम के मौके पर पहुंचने के बाद वन विभाग के अधिकारी और कर्मचारी वहां पहुंचे।
मौके पर मौजूद लकड़ी को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि हजारों पेड़ काटे गए हैं तो काटी गई लकड़ी का बड़ा हिस्सा मौके पर दिखाई क्यों नहीं दे रहा है? लकड़ी कहां गई और उसे जंगल से बाहर किसने पहुंचाया—यह जांच का अहम विषय है।
ग्रामीणों ने कक्ष क्रमांक 259 और 260 का सीमांकन, ड्रोन सर्वे और निष्पक्ष भौतिक सत्यापन कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्षेत्र में पहले कितने पेड़ मौजूद थे, कितने पेड़ काटे गए, कितनी वनभूमि प्रभावित हुई और काटी गई लकड़ी कहां गई।
अतिक्रमण और कथित मिलीभगत के आरोप
कुछ ग्रामीणों ने विभागीय स्तर पर मिलीभगत की आशंका भी जताई है। मीडिया से चर्चा में कुछ लोगों ने क्षेत्र में राजनीतिक संरक्षण के आरोप लगाए हैं। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है और किसी भी व्यक्ति, अधिकारी या कर्मचारी को जांच पूरी होने से पहले दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
ग्रामीणों का यह भी कहना है कि डाबरी क्षेत्र को बाद में शिवन्या बीट से जोड़े जाने के बाद यहां अतिक्रमण की गतिविधियां बढ़ी हैं। इन दावों की भी संबंधित विभाग द्वारा जांच किए जाने की आवश्यकता है।
उठ रहे हैं कई बड़े सवाल
- कक्ष क्रमांक 259 और 260 में पहले कितने पेड़ खड़े थे?
- अब तक कितने पेड़ काटे गए?
- कटाई कब से चल रही थी?
- काटी गई सागौन की लकड़ी कहां गई?
- वनभूमि का कितना क्षेत्र अतिक्रमण से प्रभावित हुआ?
- क्या विभाग को पहले से इसकी जानकारी थी?
- यदि जानकारी थी तो समय पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
- क्या मामले में किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है?
- क्या पूरे क्षेत्र का ड्रोन सर्वे और सीमांकन कराया जाएगा?
इस मामले की गंभीरता को देखते हुए निष्पक्ष जांच बेहद जरूरी है। जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि वास्तव में कितने पेड़ों की कटाई हुई, वनभूमि पर कितना अतिक्रमण हुआ और इसके लिए कौन जिम्मेदार है।
खबर का उद्देश्य किसी व्यक्ति विशेष को दोषी ठहराना नहीं, बल्कि ग्रामीणों द्वारा उठाए गए गंभीर सवालों को शासन-प्रशासन के सामने रखना और वन संपदा की सुरक्षा सुनिश्चित कराने की मांग को सामने लाना है।
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