अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय की निविदाओं पर उठे सवाल, PSARA शर्त को लेकर टेंडर फिक्सिंग की आशंका
बुलेट रिपोर्टर ब्यूरो रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय, रीवा द्वारा 8 जुलाई 2026 को जारी की गई दो निविदाओं को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप लगाया जा रहा है कि निविदाओं में ऐसी तकनीकी शर्तें शामिल की गई हैं, जिनकी वास्तविक आवश्यकता नहीं है और जिनसे खुली प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।
विश्वविद्यालय द्वारा निविदा क्रमांक 107/भंडार/2026 सुरक्षा प्रहरी, कुशल, अर्धकुशल एवं अकुशल श्रमिक, कंप्यूटर ऑपरेटर, ड्राइवर सहित अन्य मानव संसाधन उपलब्ध कराने के लिए जारी की गई है। वहीं निविदा क्रमांक 106/भंडार/2026 सफाई कर्मी, कंप्यूटर ऑपरेटर, कारपेंटर तथा कुशल एवं अकुशल श्रमिकों की व्यवस्था के लिए आमंत्रित की गई है।
जानकारों का कहना है कि इन निविदाओं में गैर-सुरक्षा सेवाओं के लिए भी PSARA Act, 2005 के अंतर्गत लाइसेंस अनिवार्य किया गया है, जिस पर आपत्ति जताई जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार PSARA अधिनियम केवल निजी सुरक्षा एजेंसियों और सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने वाली सेवाओं पर लागू होता है। सफाई कर्मी, कंप्यूटर ऑपरेटर, कारपेंटर तथा अन्य श्रमिक सेवाओं के लिए इस लाइसेंस की कानूनी अनिवार्यता नहीं होती।
विशेषज्ञों के मुताबिक गैर-सुरक्षा कार्यों के लिए सामान्यतः कंपनी पंजीकरण, श्रम विभाग में पंजीयन, EPF, ESIC और GST जैसे दस्तावेज पर्याप्त माने जाते हैं। ऐसे में गैर-सुरक्षा सेवाओं वाली निविदाओं में PSARA लाइसेंस की शर्त जोड़े जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
आरोप है कि इस तरह की प्रतिबंधात्मक शर्तों से कई योग्य कंपनियां प्रतिस्पर्धा से बाहर हो सकती हैं और किसी विशेष फर्म को लाभ पहुंचाने की संभावना बन सकती है। हालांकि इन आरोपों पर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से अभी कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
निविदाओं में कंप्यूटर ऑपरेटर तथा कुशल, अर्धकुशल एवं अकुशल श्रमिकों का अलग-अलग उल्लेख किए जाने पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि इससे कार्यों के दोहराव और प्रक्रिया में भ्रम की स्थिति पैदा होती है।
इसके अलावा पुलिस अधीक्षक द्वारा जारी चरित्र सत्यापन प्रमाणपत्र को निविदा प्रकाशन तिथि के बाद का अनिवार्य किए जाने पर भी आपत्ति जताई गई है। जानकारों का कहना है कि ऐसे प्रमाणपत्र सामान्य परिस्थितियों में एक निश्चित अवधि तक मान्य रहते हैं, इसलिए इस शर्त से कई पात्र एजेंसियां प्रभावित हो सकती हैं।
मामले में 17 जुलाई 2026 को निविदा शर्तों में संशोधन जारी किए जाने को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि संशोधन के माध्यम से निविदा प्रक्रिया को प्रभावित करने का प्रयास किया गया।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी और सार्वजनिक संस्थानों की निविदा प्रक्रिया में शर्तें केवल कार्य की वास्तविक आवश्यकता के आधार पर तय होनी चाहिए। अनावश्यक या असंगत तकनीकी शर्तें प्रतिस्पर्धा को सीमित कर सकती हैं और पारदर्शिता पर प्रश्न खड़े कर सकती हैं।
यदि लगाए गए आरोप सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल निविदा प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा महत्वपूर्ण विषय बन सकता है।
अब देखना होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन इन आरोपों पर क्या स्पष्टीकरण देता है और क्या संबंधित सक्षम प्राधिकारी इस मामले की जांच कराते हैं।
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